केदारनाथ -
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मंदाकिनी नदी के तट पर बसा केदारनाथ मंदिर रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। पंच केदारों में से एक, केदारनाथ मंदिर में शिव के पृष्ठ भाग की पूजा की जाती है। केदारनाथ मंदिर के अंदर स्थित ज्योर्तिलिंग, जो भगवान शिव के बारह ज्योर्तिलिंगों में से एक है,
प्राचीन काल में यहाँ जा कर लोग प्राण त्यागना पुण्य समझते थे।
केदारनाथ 11,700 फीट की ऊंचाई पर है। यहाँ बहुत ठंडा होता है। बहुत ठंडी हवाएं चलती है, सारे पर्वत हिमाच्छित रहते हैं।
केदारनाथ का निर्माण
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ऐसा कहा जाता है कि विक्रम संवत् 1076 से 1099 तक राज्य करने वाले मालवा के राजा भोज ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। लेकिन कुछ लोगों के अनुसार यह मंदिर 8वीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य ने बनवाया था। बताया जाता है कि वर्तमान केदारनाथ मंदिर के ठीक पीछे पांडवों ने एक मंदिर बनवाया था, लेकिन वह मंदिर समय की मार नहीं झेल सका। 85 फीट ऊंचा, 187 फीट लंबा और 80 फीट चौड़ा इस केदारनाथ मंदिर की दीवारें 12 फीट मोटी है और बहुत मजबूत पत्थरों से बनाई गई है। मंदिर को 6 फीट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा किया गया है।
केदारनाथ तीन तरफ से पहाड़ों से घिरा है। एक तरफ लगभग 22 हजार फुट ऊंचा केदारनाथ तो दूसरी तरफ है 21 हजार 600 फुट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ है 22 हजार 700 फुट ऊंचा भरतकुंड। यहां न सिर्फ तीन पहाड़ हैं बल्कि पांच नदियों का संगम भी है, मंदाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी इन नदियों में से कुछ को काल्पनिक माना जाता है।
कहा जाता है हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थना के अनुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया।
यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं।
महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतर्ध्यान हो कर केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया था। अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाड़ों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतर्ध्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का हिस्सा काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथ का मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमदेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है।
केदारनाथ का मंदिर 3593 फीट की ऊंचाई पर बना हुआ एक भव्य एवं विशाल मंदिर है। इतनी ऊंचाई पर इस मंदिर को कैसे बनाया गया, इसकी कल्पना आज भी नहीं की जा सकती है। मंदिर की पूजा श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है। प्रात:काल में शिव-पिंड को प्राकृतिक रूप से स्नान कराकर उस पर घी-लेपन किया जाता है। तत्पश्चात धूप-दीप जलाकर आरती उतारी जाती है, इस समय यात्री-गण मंदिर में प्रवेश कर पूजन कर सकते हैं, लेकिन संध्या के समय भगवान का श्रृंगार किया जाता है, उन्हें विविध प्रकार के चित्ताकर्षक ढंग से सजाया जाता है। भक्तगण दूर से केवल इसका दर्शन ही कर सकते हैं, केदारनाथ के पुजारी मैसूर के जंगम ब्राह्मण ही होते हैं, भगवान की पूजाओं के क्रम में प्रात:कालिक पूजा, महाभिषेक पूजा, अभिषेक, लघु रुद्राभिषेक, षोडशोपचार पूजन, अष्टोपचार पूजन, सम्पूर्ण आरती, पाण्डव पूजा, गणेश पूजा, श्री भैरव पूजा, पार्वती जी की पूजा, शिव सहस्त्रनाम प्रमुख हैं।
केदारनाथ जी का मन्दिर आम दर्शनार्थियों के लिए प्रात: 7:00 बजे खुलता है। दोपहर एक से दो बजे तक विशेष पूजा होती है और उसके बाद विश्राम के लिए मन्दिर बन्द कर दिया जाता है। पुन: शाम 5 बजे जनता के दर्शन हेतु मन्दिर खोला जाता है। पञ्चमुख वाली भगवान शिव की प्रतिमा का विधिवत श्रृंगार करके 7:30 बजे से 8:30 बजे तक नियमित आरती होती है। रात्रि 8:30 बजे केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग का मन्दिर बन्द कर दिया जाता है। शीतकाल में केदारघाटी बर्फ से ढंक जाती है।
इसलिए केदारनाथ-मन्दिर के खोलने और बन्द करने का मुहूर्त निकाला जाता है, किन्तु यह सामान्यत: नवम्बर माह की 15 तारीख से पूर्व बन्द हो जाता है और छ: माह बाद अर्थात वैशाखी के बाद कपाट खुलता है। ऐसी स्थिति में केदारनाथ की पंचमुखी प्रतिमा को उखीमठ में लाया जाता हैं। इस अवधि में प्रतिमा की पूजा यहां भी रावल जी करते हैं।
हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में उल्लेखित सबसे ऊँचा ज्योतिर्लिंग यहीं है। मन्दिर में मुख्य भाग मण्डप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। मंदिर के प्रांगण में नन्दी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं। मंदिर के गर्भ गृह में नुकीली चट्टान भगवान शिव के सदाशिव रूप में पूजी जाती है।
बाबा केदारनाथ जी का श्रृंगार करने के लिए पंचमुखी मूर्तियां हैं। इन्हें हमेशा वस्त्र तथा आभूषणों से विभूषित रखा जाता है। केदारनाथ का मंदिर काफी भव्य है। मंदिर के बाहर देवी पार्वती, पांडव, लक्ष्मी आदि की मूर्तियां विराजमान हैं। मंदिर के नजदीक हंसकुण्ड है जहां पर पितरों की मुक्ति के लिए श्रृद्धालु श्राद्ध आदि का पितृ पूजा करते हैं। मंदिर के दरवाजे पर नन्दी विराजमान हैं जो कि बाबा भोलेनाथ का वाहन है उसकी उपस्थिति इस मंदिर को अनुपम छटा प्रदान करती है। भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं।
केदारनाथ पर चढ़ाया गया जल पीने से मनुष्य के कई-कई जन्मों के पाप समाप्त हो जाते हैं जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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